
जनम लिया डाल से कट गई
गई अपनों की गोद में
अपनों की गोद सोचा जिसे
क्या गई थी अपनों की ही गोद में?
ज़िन्दगी मिली उधार जैसी
ना घर था ना कोई अपना
जिसको सोचा अपना वो तो दुनिया से भी बेगाना था
घर की तलाश में बाहर निकली बाहर अजनबियों का मेला था। सोचा अजनबियों को अपना बना लूं पर वो तो और झमेला था
ना घर ना बाहर ना अपना ना बेगाना किसको लें साथ सबके साथ में भी अकेला था
सुकून की तलाश में जहां भी गई सुकून ही की तलाश रही एक अपने की तलाश में जिंदगी उजाड़ ली
ना टूटना तुम कभी डाल से डाल तक ही सुकून है ना करना अपनों की खोज अपना तुमसा ओर नहीं
तुम ही अपना, तुम बेगाना तुम ही अपने साथ हो
सुकून तुम में नहीं तो सुकून कहीं और नहीं