इसाई मिशनरियों की साध्वियों के दोहरे मापदंड

मैं बात करना चाहती हूं उन साध्वियों की जो ईसाई मिशनरियों से सम्बन्ध रखती हैं मैं यहां एक धर्म विशेष की बात नहीं कर रही , तो इसे बिलकुल भी गलत दिशा ना दी जाए क्योंकि मैं सिर्फ इंसानियत के धर्म को मानती हूं। मैं एक अध्यापिका हूं और इनके साथ काम कर चुकी हूं ।शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों को जो परोसा जाता है वो शिक्षा या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो कदापि नहीं होती , हमारे आसपास का पर्यावरण कैसा है इसपर ही निर्भर करता है कि हम किस तरह की शिक्षा ग्रहण करते हैं , ये साध्वियों को कहने के लिए तो ये शिक्षा दी जाती है कि दुनिया की बुराइयों को इन्हे त्यागना है और एक पवित्र आत्मा बनना है परन्तु इनमें वो द्वेष भाव और भी ज्यादा है । मेरा ये कहना बिलकुल नहीं है कि ये द्वेष युक्त भावना इन सब साध्वियों में होती है, कुछ आत्माएं होती है इन सब बुराइयों से दूर जिनको सिर्फ मानवता की सेवा करनी होती है।

सबसे बुरी बात यह है कि मासूम बच्चों को भी इसका मुआवजा भरना पड़ता है। कहने को तो इनके स्कूल लड़कियों और लड़कों के लिए सांझे होते हैं पर वो सिर्फ कहने के लिए ….. वास्तव में यह देखा जाता है कि कहीं कोई लड़का या लड़की आपस में बात तो नहीं कर रहे और अगर उन्हें सिर्फ बात भी करते देखा गया तो भी उसके बाद उनके साथ क्या होगा ये तो उन्हीं को पता चलता है। इतना मानसिक कष्ट दिया जाता है इनको ये तो सिर्फ वो ही जानते हैं वरिष्ट अध्यापिकाओं के द्वारा उनके साथ जो होता है वो मैंने देखा है, उस समय मैं इन सबसे लड़ नहीं पाई क्योंकि मैं इतनी परिपक्व नहीं थी । लड़कियों को धमकी दी जाती थी कि तुम्हारे माता पिता को बताया जाएगा और ये तो सच है कि अगर आज के समय भी किसी माता पिता को बताए तो वो लड़की का विश्वास कभी नहीं करेंगे बल्कि उन्हें ही दोषी ठहराएंगे तो उन बच्चियों को वो पराए लोगों का अपमान सहना थोड़ा कम लगता है। कक्षा में लड़के लड़कियों को अलग अलग पंक्ति में बैठाना और अध्यापक का हर समय उनपर एक जासूस कि तरह नजर रखना कैसा अपमानजनक लगता होगा ।ऐसे में विद्यार्थी का संपूर्ण विकास कैसे होगा जब उनकी पहचान एक विद्यार्थी की तरह नहीं एक लिंग विशेष से की जाए।

ये मिशनरी लोगो की मदद करने के लिए होती हैं , उन विद्यार्थियों के लिए जो गरीबी में जी रहे हैं उन्हें शिक्षा का सुख देने के लिए ,.. परन्तु इन विद्यालयों में उन विद्यार्थियों को भर्ती किया जाता है जो उनके वरिष्ट अध्यापकों की पसंदीदा सूची में आते हैं चाहे वो करोडपति की औलाद क्यों ना हो , मेरे सामने एक ऐसे पिता के बच्चे को परीक्षा ना लेने की धमकी दी गई जिसका मासिक वेतन 4000 रूपए था और उसके बच्चे कि सारे साल की फीस इकट्ठी होकर 20000 से उपर हो चुकी थी …. वो पिता उस दिन कितना मजबूर था मुझे आज भी नहीं भूलना वो दृश्य। वो मजबूर पिता मुख्याध्यापिका से मिलना चाहता था पर वो मुख्याध्यापिका उससे नहीं मिली क्योंकि वो भगवान के ध्यान के लिए जाना चाहती थी। मैं चर्च में भी रोज जाती थी क्योंकि मुझे वहां शांति मिलती थी पर किसी व्यक्ति को मज़बूरी ना समझना और प्रभु की अर्चना करना ,,,,उस अर्चना का कोई लाभ है..। अच्छे अध्यापकों को नहीं उन्हें आगे करना जो सुबह शाम मुख्याध्यापक कक्ष के चक्कर लगाएं। ये फिर भी किसी हद्द तक अनदेखा किया जा सकता है परन्तु विद्यार्थी और उनके अभिभवकों की मज़बूरी ना देखना और विद्यार्थियों को लिंग के आधार पर भेदभाव करना सिखाना कहां तक सही है। आप ही सोचे आप इन विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजना चाहेंगे या नहीं

विद्यर्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलनी चाहिए ना की मानसिक शोषण का शिकार बनवाया जाए उन्हें… यह मिशनरी जो अच्छे काम कर सकती हैं अगर यह समाज को बदलना चाहे तो बदल सकती हैं। इन्होंने बदले भी हैं लोगों के हालात। परंतु इनको किसी के प्रभाव में नहीं आना चाहिए, और अपनी सच्ची नियत से काम करना चाहिए। मदर टेरेसा के विचारों को आगे ले जाना चाहिए। ये आजकल इसलिए अच्छा नहीं कर रही क्योंंकि इनको ये महसूस होने लगा है कि लोगों की लाइन लगी होती है इनके स्कूलों के बाहर , इसलिए इन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। इनको यह हमेशा प पता होना चाहिए कि वो लाइन आपके पवित्र वातावरण के भ्रम की वजह से है जिस दिन यह भ्रम निकला तो कुछ भी हो सकता है तो अपनी शिक्षा प्रक्रिया में सुधार करें। जो आपपर लोगों का विश्वास है उसे बनाए रखें। आशा है मेरे इन शब्दों को समझा जाएगा और इनपर विचार करके सुधार किया जाएगा।

Published by Mini

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